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Bajrangi Bhaijaan: Movie Reviews From Mumbai | India Tv

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Bajrangi Bhaijaan: Reviews from Mumbai. the much-awaited Salman Khan Eid release, ‘Bajrangi Bhaijaan’ is a far cry from the regular Salman Khan films. Though packed with a few self-glorification scenes and a far-fetched plot, this film, for a change, is sensible. It’s a light, emotionally-packed drama that touches your heart.

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Comment(22)

  1. Salman Khan for me this movie is a blockbuster… its the speechless movie from all u hv casted…i would b delighted to c u receiving an award for this movie.
    ur msg is a bulls eye!!
    Being Human-Salman Khan
    Jai Shree Ram MAMA!!- Munni/Shadida
    This was the most touching sceen.. may allah bless that lil girl…superb job!!

  2. Also the title has a connection between the two nation Bajrangi Bhaijaan… Awesome Eidi for Eid!! May we remain a one nation under god with liberty!!

  3. What a movie yar osm osm osm salman u r d best full paisa wasool keep it up I m big fan of your and six years old girl in this film was so cute n kareenA r also good. I love this movie yar

  4. someone who has killed in drunk state innocent people they are praising him what world has come to they should boycotte his film

  5. मैं हिंदूवादी या मुस्लिम परस्त गुटों का हितैषी नहीं हूँ ना ही किसी और धर्म या संप्रदाय का पक्षधर मगर ये ज़रूर कहूँगा कि इससे घटिया फिल्म हो ही नहीं सकती जो आपसे ही कमाकर बनी हो और आपके ही चरित्र का हनन करे. यहाँ तक कि आपके ही दुश्मन की तारीफ में कसीदे पढ़ते हुए आपकी विकृत तस्वीर बनाकर उसके घर में टांग आये. लगभग हर व्यक्ति मेरी इस राय के खिलाफ खड़ा नज़र आता है, मगर यकीन मानिये ये देश वाकई इतना मूरख है कि आपको सरे आम गाली दी जा रही है और आप गाली को कविता मानकर उसे सराहे जा रहे हैं. मेरी नाराज़गी की वजह बजरंगी को भाईजान कहा जाना बिलकुल नहीं है. I saluted Kabir Khan when I was watching climax of his patriotic movie 'Phantom', but I hate this biased movie Bajrangi Bhaijaan.

    Reason of my protest against Bajrangi-Bhaijaan: फिल्म का नाम पहली बार सुनते ही मुझे ये नाम "बजरंगी-भाईजान" बहुत पसंद आ गया था, जो दो शब्दों में ही पूरी कहानी की मूल भावना बयान कर देता है। इसलिए इस फिल्म को देखने की बहुत चाह थी, लेकिन टिकिट 46 दिनों बाद हाथ लग सकी क्योंकि भीड़ टिकिट काउंटर छोड़ने को राज़ी ही नहीं थी। थेटर में दाखिल हुआ तो सोचा था, रुपहले परदे पर दो-पैदाइशी दुश्मन देशों की फ्रेन्शिप होती देखने मिलेगी, लेकिन भद्दी-भद्दी गालियां खाकर बाहर आया।

    ये कैसा तुलनात्मक अध्यन है कबीर खान का कि पाकिस्तान में एक विलेन(सीनियर आईएसआई ऑफिसर) बाकी सारे हीरो, जबकि भारत में एक हीरो (बजरंगी भाई) बाकी सारे घिनोने विलेन। माना की दुश्मन से दोस्ती करनी हो तो उसके दिए पुराने घावों को कुरेदना मुनासिब नहीं, पर दोस्ती का ये कौन सा तरीका हुआ कि एक तरफ दुश्मन के सारे कुकर्म छुपाकर उसके सिर्फ गुणों को गिनाया जाए और दूसरी तरफ अपने गुण छुपाकर खुदके सिर्फ अवगुणों की चर्चा करें। ये तो वही बात हुई की जंगली कुत्ते से दोस्ती करनी हो तो आदमी को भोंकना सीखना पडेगा। अरे भाई पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाना हो तो उसे सुधरकर इंसानियत के दायरे में आने को कहिये, ना की भारत को उसकी घिनानी चालबाजियों से भरे काले समुन्दर में गोता लगाने को मजबूर किया जाना चाहिए।

    इस फिम में कितनी सारी पारस्परिक विषमताओं को सिरे से उलटकर दिखाने का प्रयास किया गया है, मसलन: पाकिस्तान में जितनों ने बजरंगी पर हाथ उठाया, बंदूकें तानी या उलटा लटकाकर लाठियां भांजी वो सब के सब अपनी ड्यूटी निभा रहे थे, जैसे पाकिस्तान फ़ौज का अफसर, पुलिस थाने का दरोगा. अगर पाकिस्तान में कोई बुरा था तो वो सीनियर पोलिस अधिकारी जो सलमान को किसी भी हाल में जासूस साबित करके गिरफ्तार करना चाहता था. बाकि बस-ड्राइवर, सवारियां, मौलाना साहब, रिपोर्टर नवाजुद्दीन सिद्धकी समेत सारे पाकिस्तानी बाशिंदे भले मानुष ही थे. जबकि इसके उलट जैसे ये दिखाने की कोशिश की गई है कि भारतीयों में इंसानियत नाम की चीज़ ही नहीं होती. उदाहरण के तौर पर मुन्नी इंडिया में खो गई तो केवल एक आदमी (सलमान खान) उसकी मदत को आगे आता है, हालाँकि कई बार उससे पिंड छुड़ाने की कोशिश भी करता है. दूसरी नेकदिल शख्सियत बताई गई करीना कपूर, लेकिन बाकी सारे लोग निहायत ही खुदगर्ज़ किस्म के दिखाए गए. उदाहरण के तौर पर करीना के पिता उस बच्ची की मदत को वक्त की बर्बादी बताते हैं, गैर मज़हबी और पाकिस्तानी होने की वजह से उसे अपने घर में जगह देने से इनकार कर देते हैं. पाकिस्तान में दाखिल होने के दौरान बॉर्डर के नीचे जितनी भी सुरंगें बताई गईं उन सबका इस्तेमाल सिर्फ इंडिया से पाकिस्तान में दाखिल होने के लिए होता दिखाया गया, जिनका पता चलते ही पाकिस्तानी फ़ौज भोंचक रह जाती है. उलटा चोर जो कोतवाल पर उंगलियाँ उठता फिरता है इस फिल्म ने तो उसीके दावे की पुष्टि कर दी कि पाकिस्तान में आतंकवाद इंडिया द्वारा एक्सपोर्ट होता. कबीर खान ने कपटी पाकिस्तान को नेक बताकर शराफत के प्रतीक इंडिया का दामन गंदे-घिनौने किरदारों से दागदार कर दिया. उदाहरणस्वरुप अच्छी खासी आमदनी कमाने वाला ट्रेवल एजेंट ना केवल पैसे लेकर ग्राहकों को धोका देता है बल्कि एक्स्ट्रा पैसों के लालच में एक छह साल की मासूम बच्ची को रेड लाइट एरिया में बेचने पहुँच जाता है. ऊपर से खरीदार महिला के माथे पर ट्रेफिक सिग्नल जितनी बड़ी लाल बिंदी जैसे चीख-चीख कर उसके धर्म का परिचय दे रही है. सलमान को बजरंगबली के भक्त के रूप में चित्रित करके उसे मज्ज़िदों और मज़ारों से परहेज़ बरतता दिखाकर हिन्दू समुदाय को धार्मिक असहिष्णु(भेदभाव पसंद) बताने की कोशिश की गई है जबकि असलियत इससे उलट है, लगभग हर हिन्दू, मज्जिद या मजारों के सामने से गुज़रते हुए सम्मानपूर्वक सर झुका लेता है. और जो पाकिस्तानी आवाम किसी हिन्दू मठ-मंदिर में कदम रखना तो दूर उनकी मौजूदगी को ही इस्लाम की तौहीन समझते हैं, आपने उन्हें सर्व धर्म सदभाव का समर्थक बता दिया. आप इतने पर ही नहीं रुके, भारत को पाकितान के सामने नीचा दिखाने की होड़ में इस कदर अन्धे हुए कि, आपने राजधानी दिल्ली में पाकिस्तान एम्बेसी के दफ्तर के बाहर केसरिया झंडे लहराते उग्र हिन्दू कट्टरपंथियों की भीड़ को पोलिस बैरिकेट्स तोड़ते हुए दिखाया जो एम्बेसी के अंदर दाखिल होने की कोशिश कर रहे थे. अब ये भी तो समझाइये कि पाकिस्तान से उनकी जेल में बंद किसी अपने को छुड़ाने के लिए कौन सी भीड़ पाकिस्तान एम्बेसी के सामने ऐसा उग्र प्रदर्शन करेगी और चलो एक पल के लिए मान भी लेते हैं की कर लिया, तो ज़रूरी है क्या कि वे सेफ्रून पार्टी के कार्यकर्ता ही होंगे. साफ़ दिखाई देता है कि कबीर साहब जैसी शख्सियत जो हरे चोले में लिपटे आतंकियों के मानवीय पहलु भी खंगालकर बाहर ले आते हैं उनके मन की गहराई में मैत्रीपरक और सर्वधर्म सदभाव के प्रतीक नारंगी रंग के लिए क्या जगह है, इस फिल्म से आपने सेप्रेटिस्ट और धोकेबाज पाकिस्तान को संत बताया और भारत की छवि मटियामेट करने की कोशिश की लेकिन हैरत की बात है कि भारत में इसके खिलाफ किसी दर्शक ने एक शब्द नहीं कहा, भारतीयों की सहनशीलता की इससे बड़ी मिसाल क्या हो सकती है, जिसे आप बेवजह बदनाम करने निकले हैं.

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